Single Papa Review: कभी-कभी ऐसी कहानियाँ सामने आती हैं, जो बिना शोर मचाए दिल के बहुत करीब पहुंच जाती हैं। Single Papa भी कुछ ऐसी ही वेब सीरीज है। यह शो हंसी, भावनाओं और पारिवारिक रिश्तों के बीच एक बेहद सच्चा सवाल रखता है — क्या एक पुरुष अकेले बच्चे की परवरिश कर सकता है? Netflix पर स्ट्रीम हो रही यह सीरीज इस सवाल का जवाब बेहद सादगी और संवेदनशीलता के साथ देती है।
कहानी: एक लापरवाह इंसान से जिम्मेदार पिता बनने का सफर
कहानी के केंद्र में हैं गौरव गहलोत (कुनाल खेमू), एक हरियाणवी मिज़ाज का, थोड़ा गैर-जिम्मेदार और बचकाना युवक। वह पिता बनना चाहता है, लेकिन उसकी पत्नी अपर्णा (ईशा तलवार) को लगता है कि गौरव खुद अभी बड़ा नहीं हुआ है। इसी सोच के टकराव के चलते दोनों अलग हो जाते हैं।
कहानी तब मोड़ लेती है जब एक नन्हा बच्चा अचानक गौरव की जिंदगी में आ जाता है। वह उसे प्यार से “अमूल” कहता है और बिना किसी शर्त उसे अपनाने का फैसला कर लेता है। यह फैसला जितना भावनात्मक है, उतना ही मुश्किलों से भरा भी।
संघर्ष: समाज, सिस्टम और परिवार के खिलाफ जंग
गौरव का रास्ता आसान नहीं है। सेंट्रल अथॉरिटी ऑफ चाइल्ड अडॉप्शन की अधिकारी रोमिला नेहरू (नेहा धूपिया) उसे बच्चे को गोद लेने के लायक नहीं मानतीं। वहीं घर में भी हालात अनुकूल नहीं हैं।
- शराबी और गुस्सैल पिता (मनोज पाहवा)
- भावुक मां (आयशा रज़ा)
- बहन नम्रता (प्राजक्ता कोली), जिसे अपने ससुराल की चिंता है
इन सबके बीच गौरव सिर्फ एक ही बात जानता है — अमूल उसका बच्चा है, और वह उसे छोड़ नहीं सकता।
भावनाओं और हास्य का खूबसूरत मेल
शुरुआत में शो की रफ्तार थोड़ी धीमी लग सकती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह अपनी पकड़ मजबूत कर लेती है। लेखन में हल्का-फुल्का हास्य और अचानक उभरने वाले भावनात्मक पल शो को खास बनाते हैं।
एक सीन में घर का झगड़ा बेहद हास्यास्पद लगता है, लेकिन कुछ ही पलों में वह गंभीर मोड़ ले लेता है। यही संतुलन Single Papa को एक सच्चा पारिवारिक शो बनाता है।
कुनाल खेमू की परफॉर्मेंस: सादगी में दम

कुनाल खेमू इस सीरीज की जान हैं। उन्होंने गौरव के किरदार को मासूमियत, जिद और प्यार के अनोखे मिश्रण के साथ निभाया है।
उनका हास्य इस बार ज्यादा शांत और नैचुरल है, जो भावनात्मक दृश्यों में और भी असरदार बन जाता है।
नेहा धूपिया अपने सख्त लेकिन ईमानदार किरदार में प्रभावशाली हैं। मनोज पाहवा हमेशा की तरह मजबूत दिखाई देते हैं। आयशा रज़ा मां के किरदार में दिल को छू जाती हैं।
हालांकि, प्राजक्ता कोली का अभिनय कुछ दृश्यों में जरूरत से ज्यादा ऊंचा लगता है, जो बाकी कलाकारों के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता।
नई सोच के साथ मर्दानगी की परिभाषा
Single Papa की सबसे बड़ी ताकत इसकी सोच है। यह शो दिखाता है कि मर्दानगी सिर्फ सख्ती या नियंत्रण नहीं होती, बल्कि उसमें संवेदनशीलता और देखभाल भी शामिल हो सकती है।
डायनंद शेट्टी का “मैननी” वाला किरदार इस सोच को खूबसूरती से सामने रखता है। उनका संवाद — “मर्दानगी मातृत्व जैसी क्यों नहीं हो सकती?” — शो की आत्मा को बयान करता है।
क्या देखनी चाहिए यह सीरीज?
अगर आप ऐसी कहानी देखना चाहते हैं जो
- दिल को छुए
- हल्की-फुल्की हंसी दे
- और रिश्तों पर सोचने पर मजबूर करे
तो Single Papa आपके लिए एक शानदार विकल्प है। यह शो शोर नहीं मचाता, लेकिन धीरे-धीरे दिल में अपनी जगह बना लेता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख शो से जुड़ी उपलब्ध जानकारी और लेखक की व्यक्तिगत समझ पर आधारित है। दर्शकों का अनुभव अलग हो सकता है।
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