Varsha Bharath की Bad Girl: एक तमिल फिल्म जो सवाल उठाती है, लेकिन अधूरी लगती है

By: Shubham Ingale

On: Sunday, September 7, 2025 12:30 PM

Bad Girl
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हम सभी अपने जीवन में कहीं न कहीं एक “घर” खोजते हैं—एक ऐसी जगह जहां हम बिना किसी सामाजिक बंधन के खुद को जी सकें। वरषा भारत (Varsha Bharath) की पहली फिल्म Bad Girl भी इसी तलाश की कहानी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फिल्म केवल एक लड़की की निजी लड़ाई को दिखाती है, या फिर यह सचमुच एक गहरी नारीवादी (feminist) आवाज़ बनने की कोशिश करती है?

फिल्म की कहानी: घर और पहचान की तलाश

फिल्म की नायिका राम्या (अंजलि शिवरामन) एक ब्राह्मण परिवार से आती है, जहां “मान-इज़्ज़त” और जाति को लेकर कठोर नियम हैं। बचपन से लेकर उसके तीसवें दशक तक की यात्रा में हम देखते हैं कि वह कैसे प्रेम, इच्छाओं और रिश्तों में उलझती है।

राम्या के लिए असली संघर्ष सिर्फ प्यार पाने का नहीं है, बल्कि एक ऐसी जगह खोजने का है जहां वह बिना किसी सामाजिक दबाव के अपनी जिंदगी जी सके—even अगर वह जगह केवल उसकी बिल्लियों और पौधों के साथ ही क्यों न हो।

नारीवाद का अधूरा चेहरा

फिल्म खुद को “radically feminist” दिखाना चाहती है, लेकिन कई बार यह कोशिश सतही लगती है।

  • राम्या की लड़ाई ज़्यादातर खुद के लिए है, न कि जाति-व्यवस्था या पितृसत्ता को तोड़ने के लिए।
  • उसके रिश्तों में दिखाई गई टॉक्सिसिटी (toxicity) और उनसे बाहर निकलने की प्रक्रिया relatable है, लेकिन गहराई में यह सवाल नहीं करती कि अलग-अलग वर्ग, जाति और रंग की महिलाओं का अनुभव कितना अलग होता है।
  • एक डायलॉग में राम्या अपनी एक्स की गर्लफ्रेंड को “maida maavu girl” (गोरे रंग वाली) कहकर मजाक उड़ाती है। यह beauty standards पर सवाल तो उठाता है, लेकिन खुद राम्या भी गोरी और हल्की आंखों वाली है—इसलिए संदेश अधूरा लगता है।

अभिनय और म्यूज़िक

  • अंजलि शिवरामन का अभिनय कई जगहों पर थोड़ा बनावटी लगता है, जैसे वह एक साथ bold और girl-next-door बनने की कोशिश कर रही हों।
  • वहीं शांति प्रिया (राम्या की मां) का किरदार ज्यादा परतदार और असरदार बनकर सामने आता है।
  • अमित त्रिवेदी का म्यूज़िक, खासकर “Home”, बेहद soulful है और फिल्म की थीम को खूबसूरती से उभारता है।

सेंसरशिप और विवाद

फिल्म रिलीज़ से पहले ही विवादों में घिर गई थी। टीज़र को लेकर विरोध हुआ और CBFC ने लगभग 20% कट्स लगाने को कहा। यही वजह है कि सिनेमाघरों में दिखाई गई Bad Girl वही फिल्म नहीं रही, जिसने Rotterdam International Film Festival में NETPAC अवॉर्ड जीता था।

दिल तो है, पर अधूरी है लड़ाई

Bad Girl एक साहसिक कदम है, खासकर एक डेब्यू डायरेक्टर के लिए। यह महिलाओं की इच्छाओं और उनकी स्वतंत्रता की बात करती है, लेकिन जाति और वर्ग की गहराई तक नहीं उतर पाती।

यह फिल्म उन दर्शकों को छू सकती है, जो अपनी पहचान और स्वतंत्रता की तलाश में हैं। लेकिन अगर आप एक गहरी anti-caste feminist फिल्म की उम्मीद करते हैं, तो यह अधूरी लगेगी।

डिस्क्लेमर: यह समीक्षा केवल जानकारी और मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसका फिल्म के निर्माताओं, कलाकारों या प्रोडक्शन टीम से कोई व्यावसायिक संबंध नहीं है।

Shubham Ingale

Dhanchkara.in के Founder और Author। मैं यहाँ पर आसान भाषा में लेटेस्ट Tech News, Automobile Updates और Entertainment Stories शेयर करता हूँ। मेरा लक्ष्य है कि readers तक हमेशा Unique, Accurate और Updated Content पहुँचे।
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